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*सीखना/अधिगम Learning*
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1. *सारटेन, नॉर्थ, स्ट्रेंज तथा चैपमैन (Sartain, North, Strange and Chapman)के अनुसार, "सीखना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा अनुभूति या अभ्यास के फलस्वरूप व्यवहार में अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन होता है।"*
2. *रिली तथा लेविस (Reilly & Lewis) के अनुसार, "अभ्यास या अनुभूति से व्यवहार में धारण योग्य परिवर्तन को सीखना कहा जाता है।"*
3. *बालक जन्म लेने के साथ ही सीखना प्रारम्भ करता है। पहले वह माता के स्तन से दूध पीना सीखता है, तत्पश्चात् वह ध्वनि एवं प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया करना सीखता है। भूखे रहने पर वह रोना सीखता है ताकि माँ उसे दूध पिला दे। वोतल द्वारा दूध पिलाये जाने पर वह निपल मुँह में कैसे ले यह सीखता है।*
4. *थार्नडाइक के सीखने के नियम*
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1. *थार्नडाइक ने सीखने की तीन प्रमुख विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार किया है-*
*(a) सीखने की प्रक्रिया पशु में हो या मनुष्य में, समान ढंग से होती है।*
*(b) सीखना क्रमोत्तर होता है, न कि सूझपूर्ण होता है।*
*(c) सीखने में चिंतन या विवेचन का स्थान नहीं होता है।*
5. *थार्नडाइक ने सीखने के सिद्धांत का तीन महत्वपूर्ण नियम तथा पाँच सहायक नियमों का भी वर्णन किया है। वे तीन महत्वपूर्ण नियम इस प्रकार हैं-*
*(a) तत्परता का नियम (Law of Readiness):* तत्परता के नियम का तात्पर्य यह है कि जब प्राणी अपने को किसी कार्य को करने के लिए तैयार समझता है तो बहुत शीघ्र कार्य करता है या सीख लेता है और उसे अधिक मात्रा में सन्तोष भी मिलता है।
1.*तत्परता में कार्य करने की इच्छा निहित है।* इच्छा न होने पर प्राणी डर के मारे अवश्य बैठ जायेगा लेकिन वह कुछ नहीं सीख पायेगा। तत्परता ही बालक के ध्यान को केन्द्रित करने में सहायक होती है।
2. तत्परता के नियम का अभिप्राय यह है कि *जब प्राणी किसी कार्य को करने के लिए तैयार रहता है तो उसमें उसे आनन्द आता है और वह उसे शीघ्र सीख लेता है। जिस कार्य के लिए वह तैयार नहीं होता और उस कार्य को करने के लिए बाध्य किया जाता है तो वह झुंझला जाता है और शीघ्र सीख भी नहीं पाता है।*
6. *थार्नडाइक ने तत्परता के नियम में तीन परिस्थितियों का वर्णन किया है-*
1. जब व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए तत्पर रहता है और उसे वह कार्य करने दिया जाता है, तो इससे उसे संतोष होता है।
2. जब व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए तत्पर रहता है और उसे वह कार्य करने नहीं दिया जाता है, तो इससे उसमें खीझ (Annoyance) उत्पन्न होती है।
3. जब व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए तत्पर नहीं रहता है और उसे वह कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है, तो इससे भी उसमें खीझ होती है।
7 .*सीखने वाले व्यक्ति में संतोष (Satisfaction) या खीझ (Annoyance) होना व्यक्ति की तत्परता (Readiness) पर निर्भर करता है।*
*शैक्षिक दृष्टिकोण से यह नियम काफी महत्वपूर्ण है। इसके शैक्षिक महत्व इस प्रकार हैं-*
8. शिक्षकों को पहले *बालकों की अभिरुचि एवं अभिक्षमता (Aptitude) का मापन कर लेना चाहिए ताकि उनकी तत्परता का उन्हें सही-सही ज्ञान हो।*
9. शिक्षकों को बालकों की *तत्परता के अनुरूप शिक्षण देना चाहिए।*
10. ऐसी परिस्थिति में बालकों में *आत्म-संतोष (Self Satisfaction) अधिक होगा और वे विषय को ठीक ढंग से सीखकर लंबे समय तक उसे धारण (Retain) किये रहेंगे।*
11. *अभ्यास का नियम (Law of Exercise):* अभ्यास के नियम के अनुसार किसी क्रिया को बार-बार दुहराने से वह याद हो जाती है और छोड़ देने पर या अभ्यास नहीं करने पर वह भूल जाती है। इस प्रकार यह नियम प्रयोग करने तथा प्रयोग नहीं करने पर आधारित है।
12.अभ्यास का नियम यह बताता है कि *अभ्यास करने से उद्दीपन (Stimulus) तथा अनुक्रिया (Response) का संबंध मजबूत होता है तथा अभ्यास रोक देने से यह संबंध कमजोर पड़ जाता है या उसका विस्मरण हो जाता है।*
13. जब हम किसी पाठ या विषय को बार-बार दोहराते हैं तो उसे सीख जाते हैं। *इसे थार्नडाइक ने उपयोग का नियम कहा है।* जब हम किसी पाठ या विषय को दोहराना बन्द कर देते हैं तो उसे भूल जाते हैं, इसे उन्होंने *अनुपयोगी नियम (Law of Disuse) कहा है।*
14. *अभ्यास के नियम का शैक्षिक महत्व निम्नलिखित है-*
1. शिक्षकों को चाहिए कि वे छात्रों को कक्षा (Class Room) में *अधिक से अधिक बार विषय या पाठ को दोहराने दें।* इसमें *छात्रों को जल्दबाजी नहीं बरतनी चाहिए।*
2. छात्र किसी सीखे गये विषय को अधिक दिनों तक याद रखें, इसके लिए *शिक्षकों को चाहिए कि वे छात्रों से बीच-बीच में सीखे गये विषय को देखते रहने का सुझाव दें।*
3. शिक्षकों को कक्षा में यह सचेत कर देना चाहिए कि *यदि छात्र सीखे गये विषय को बीच-बीच में दोहराते नहीं रहेंगे तो उनका विस्मरण हो जायेगा।*
*आलोचना :* थार्नडाइक के *अभ्यास के नियम में समझने पर बल नहीं देकर यंत्रवत् पुनरावृत्ति या अभ्यास पर बल दिया गया।* मानव जीवन में इस प्रकार की यंत्रवत् पुनरावृत्ति नहीं मिलती।
15. थार्नडाइक ने इस कमी को दूर करने के लिए 1935 के लगभग उसने अभ्यास के नियम में संशोधन कर *नियन्त्रित अभ्यास का नियम प्रतिपादित किया।*
*नियन्त्रित अभ्यास की क्रिया में क्रिया की पुनरावृत्ति के साथ-साथ अर्थ को समझने, तर्क करने, विचारों का साहचर्य, सीखने के संकेतों का अनुसरण आदि सभी क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं।*
*(c) प्रभाव का नियम (Law of Effect):* इस नियम को 'सन्तोष असन्तोष का नियम' भी कहते हैं। इसके अनुसार जिस कार्य को करने से प्राणी को हितकर परिणाम प्राप्त होते हैं और जिसमें सुख और सन्तोष प्राप्त होता है, उसी को व्यक्ति दोहराता है। जिस कार्य को करने से कष्ट होता है और दुःखद फल प्राप्त होता है, उसे व्यक्ति नहीं दोहराता है।
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